भीघ रहा था बदन
और गगन से प्रश्न थे,
परोक्ष क्यूँ है खड़ी,
यह इंसानियत की नग्नता
क्यूँ काटते ख़ुशी को हम,
और अतृप्त क्यूँ है मन सदा.
बढ़ रही है क्यूँ भला,
यह भावना द्रोह की,
जो दिन नए तो आ रहे,
पर कर्म वही क्यूँ पाप का.
बूझ रहा हूँ अभी,
यह पहेली गर्भ की.
पाप पहले था खड़ा
या जन्म हुआ मनुष्य का.
मूक हूँ और लड़ रहा,
इन अश्रुओं की धार से.
जार-जार है बदन,
प्रश्न अब यह हँस रहे
भीग रहा है बदन,
और रंग लहू का है.
चोट है अपरोक्ष सी,
और गगन से प्रश्न है…
और गगन से प्रश्न है…
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