सुन ली इस बार

22 Oct

नयी दुआ के साथ आया था नया साल,
साल के शुरुआत में चाहा था कई बार,
फिर कोई मिले, कोई नयी मिले,
फिर एक दिन लगा खुदा ने सुन लिया इस बार.

झाप्पिआं, पप्पिआं और क्या क्या न चाहा मैंने,
होली में टेसुओं को गेसुओं में ना डाला मैंने,
बाप,बहिन, भाई, माँ को भी किया नमन इस बार,
लगा खुदा ने सुन लिया है इस बार.

इरादे रखे नेक, धोई उसके घर में प्लेट,
याद है, खिलाया मैंने उसको सबसे पहले केक,
मिलने के प्लान बनाये बारम बार,
लगा के खुदा ने सुन ली इस बार,

सोचा दिखाऊँ मूवी लेके पैसे उधार,
ऑफर दिया की बुला लो घर बार,
पर देखि अकेले, लिए उसका बुखार,
लगा के खुदा ने सुन ली है इस बार.

कुछ गड़बड़ लगी मुझे,
कभी कभी दीखते थे वोह खीजे,
बचा थप्पड़ खाने से कई बार,
फिर भी लगा के खुदा ने सुन ली है इस बार.

दिन बा दिन आने हुए फ़ोन कम,
राखी पे हो आई आंखें नाम,
परिवार वाद ने किया कमाल,
ऊपर वाले ने धोका फिर दिया इस बार.

पर होंसलों की डोंगी पे में हो सवार,
लिए फिर से में पुराने विचार,
इस दिवाली करूँ नए साल का इंतज़ार,
शायद खुदा ना दे धोका अगली बार.

This is second part of a kinda popular and highly appreciated poem of mine, नए साल में नयी मिल जाये|

I dont know whether this is better or worse than that, but yes this again is an honest try to spice things up.

One Response to “सुन ली इस बार”

  1. safat alam November 4, 2008 at 6:47 pm #

    आज ईश्वर को मानते तो सब हैं परन्तु पहचानते बहुत कम लोग हैं हमारी रचना क्यों हुई ? हम धरती पर क्यों आए ? हमें कहाँ जाना है ? क्या सब धर्म बराबर है ? क्या ईश्वर अवतार लेता है ? मुक्ति कहाँ है ? कल्कि अवतार कौन हैं ? हमारा वास्तविक धर्म क्या था ? इत्यादि प्रश्नों का उत्तर जानने के इच्छुक हैं तो इस ब्लौग का अवश्य अध्ययन करें। http://safat.ipcblogger.com/blog सब से अन्त में अवतरित होने वाला ग्रन्थ पवित्र क़ुरआन है जो मानव के कल्याण हेतु अवतरित हुआ है, इस का सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है। कृपया इस के सम्बन्ध में अवश्य पढ़े धन्यवाद

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