क्या करें इस इश्क का

22 Feb

तेरी आंखें भूरी है भूरे बलब में,
और काली है बिन सूरज के कोहरे में.
यह गड़बड़ है क्या मेरी रगों में,
या तू सच में नागिन बन लिपटी है मेरे मन से.

फलस्वरूप मुझे लोग पागल कहने लगे है,
किंचित सत्य किसी और खड़ा मुस्कुरा रहा.
बिन लोगों के ही मेरे चेहरे पे मुस्कान है,
भीड़ में खड़ा हर आदमी मुझे देख हैरान चिरमिरा रहा .

विचलित मन के कई आईनों तस्वीर वही पुरानी है,
तेरे बालों को अब देख के भी तेरी दो चोटियों की याद आनी है.
भोजनावकाश में भी भोजन अब बैरी बन बेठा,
तेरी याद में अब भोजन लघभग भजन सा बजता है.

मेरी बातों पे जमाना भले फ़ब्तिया कस ले,
मेरे चेहरे पे फिर भी तुझे देख भावनाओ का तांता सजता है.
हर और सृजन पे कर्ता का नाम है,
फिर क्यूँ यह थोडा टूटा दिल बेनाम सा लगता है.

मुश्किल की घडी होगी मगर में कह दूंगा,
बार बार भले न मिले, पर दिल तो सफा करना है.
अगले जनम का इंतज़ार तो मुश्किल है,
इस जनम ही प्यार का पूरा अदजुस्त्मेंट का मौका रखना है.

This completes the Hindi Triad on Deep Extinguished romance. This poem is inspired from real life characters, and yes they are very common.

3 Responses to “क्या करें इस इश्क का”

  1. Kriti May 24, 2010 at 6:38 pm #

    is janm me hi mil gayegi 2 choti wali😉

  2. aanchaltripathi May 25, 2010 at 11:50 pm #

    Hy……..i really like this one!🙂 nice!!

  3. kartik trivedi May 26, 2010 at 9:24 am #

    Thanks Thanks…thanks to all…

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