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Colors

21 Mar

दर्द कोई निचोडूं तो रंग होगा क्या?
लाल तो मेरे लहू का रंग है,
मेरे स्वप्न का रंग होगा क्या?
पीला तो इस माटी का रंग है,
मेरे पसीने का रंग होगा क्या?
नीला तो असमान ने ओढ़ रखा है,
मेरे अरमानो का रंग होगा क्या?
काली तो यह घटाएं है,
इस उद्वेलित मन का भला रंग होगा क्या?
तुम संग होते तो बताते,
तुम संग होते तो साथ रंग मिलाते,
तुम नहीं हो, तो क्या पता,
दर्द कोई निचोडूं तो रंग होगा क्या?

Twelve lines in ten minutes

18 Mar

Realized that writing in short bursts can be quite good.

हर दिन हर पल जो बांधता है,
यादों में यादों को ताकता है,
फिर चुप ही चुप में भांपता है,
आपका, मेरा यह ठरकी दिल.

हर मुस्कान का मतलब रहा ढूंढता,
तकरार की पहेली रहा बुझता,
बावरा जो बावरा ना कह सका,
आपका, मेरा यह ठरकी दिल.

लफ्फाजी की गफलत में फस कर,
अलबेले जुमलो से सज कर,
आखिर कब तक दम भरेगा,
आपका, मेरा यह ठरकी दिल.

The tale of the tree

17 Mar

दूर से देखो तो हर दरख्त की एक कहानी है,
थोड़ी धुप में सिकी, थोड़ी बारिश में पकी,
कभी राहगीर की कही, तो कभी हवा संग बही,
कभी कोयल ने गाई, तो कभी झींगुरों ने सुनाई,
रोज नए किरदार है, रोज सजता दरबार है,
कभी समझ में आए तो कभी भुरभुरी सी याद रह जाये,
दूर किसी किनारे पर बनी, कभी अश्रुओं की धार से बंधी,
थोड़ी अपनी, थोड़ी परायी, थोड़ी नयी, थोड़ी पुरानी,
दूर से देखो तो हर दरख्त की अपनी ही एक कहानी है.

Random Lines – Romantic Poetry

17 Mar

रोशन है आशियाँ और आज आंख मेरी नम है,
वोह दूर भले बेठे है मुझसे, पर यह कायनात तो मेरे संग है.
कुछ रोष तो है, कुछ सांसें भी बेदम है,
काश काबू में हर पल होता मेरे, यहाँ तो बदल रही दुनिया हर क्षण है.
बूंद बूंद बहते हुए आंसुओ को भी अकेलापन सालता है,
यहाँ तो पूरी धार बह रही है, तीनो जहाँ हैं करीब मगर अकेले हम है.

I aim to be major rom-dram writer in India.

Random Lines

12 Mar

Decided to pen few lines before starting with some serious work. Well, these are definitely romantic, but they arent written for someone specific. This reminds me of a latest conversation with my friend.

My Friend: Man, you write poems, that is impressive.

Me: Nah! I dont think so, but yeah sometimes I feel I write good.

My Friend: Its good tool to impress girls.

Me: I write in Hindi…

My Friend: Ohh…is that bad?

Me: I guess so. I am still single.

Meanwhile, enjoy these lines.

वोह आंसुओं में भी सागर को ढूंड लेते है,
वोह हालात-ऐ-दिल को अपनी चुनर में समेट लेते है,
वोह तो खुदा है इस बेज़ार दिल के,
ठगी है यह उनकी की वोह हमसे बेहतर हमको समझ लेते है…

The Man and The Bird (Maanav aur Parinda)

11 Mar

I have nearly spent an hour writing this poem. And even after spending all that time I wish to revisit this sometime later and edit it. The context is obvious, as I did not want to pretend a deep context, meanwhile what interest me about this poem is that its present structure offers me to write with three perspective, one that of the man, then of the bird and finally that of the narrator.

I dont like explaining my poems and hence I wont to do so…If its clear then it is, else it is not. For me, I will be revisiting this piece in near future.

झूट-सच से दूर, कहीं एक परिंदा है,
उड़ता है, कभी तो वो आंख मूंद के चलता है,
अलबेला है, गम-ख़ुशी से अन्बिघ्य
मुक्त गगन में वीर बन विचरता है,
पर मानव निर्मित परिभाषाओं से डरता है.

क्यूँ द्रवित हैं वो,
क्यूँ व्यथित हैं  वो,
मानव तो गलती से सीखा,
क्यूँ उस ज्ञान से भगता है वो.

मानव शायद सही है कहता,
झूट सच, गम ख़ुशी से भला कोन दूर है रहता,
मूढ़ है, अँधा है, और है वो बहरा भी,
परिभाषित तो पूर्ण जगत है,
क्यूँ डरता है? शायद अपनी मति की भरता है.

दम्भी है वो,
वाचाल है वो,
मानव तो अब उसपे हँसता,
क्यूँ सीधी बात ना समझता है वो.

धर्म अधर्म से दूर, तर्क बड़ा विचित्र है,
मूढ़ मति हो, या अँधा हो,
जब गगन है सबका, और पंख है उसके,
जब निश्चय उसका, और स्वप्न भी उसके,
तो क्यूँ परिभाषाएं सिर्फ मानव की.

है विरला वो,
धुनी है वो,
मानव नहीं, वोह है परिंदा!
और इसी बात को कह उड़ता है वो.

Few random lines…

9 Mar

Few lines were just bubbling through and I decided to pen them, rather than waiting for them to mature.

ह्रदय आह्लादित हुआ है फिर,
गाने को है गीत नए,
वोह सोचे और में सोचूं
क्या करूँ  की कहलाऊँ मृत्युंजय।

है विहंगम दृश्य बड़े यह,
समकक्ष खड़ी है नग्न धरा,
चित्र रचूँ या आंख भरूँ,
क्या करूँ की कहलाऊँ मृत्युंजय।

* * *

मैं मानव हूँ, मैं ही हूँ दानव,
प्रश्न करूँ क्यूँ फिर परमेश्वर से.
जब मैं हरता हूँ खुद ही जीवन,
तब दारुण दुःख से क्यूँ ह्रदय है विचलित.

I will fight…

17 Feb

मैं जागूँगा, मैं लडूंगा,
मैं गाऊंगा राग यही…
स्वप्न में दुस्वप्न में,
प्रेम में या घात में,
हो वीरता या अधीरता,
मन तृप्त हो, अतृप्त हो,
मैं करूँगा प्राण यही…
मैं जागूँगा, मैं लडूंगा,
मैं गाऊंगा राग यही…

Rakt Pipaasu (Blood Thirsty)

13 Feb

धर्म की ढाल, अधर्म की धार,

निश्चय कर, अभिमानित हो के,

क्यूँ कर्म के रथ पे आरूढ़ तू हो चला ।

रण भी है, प्रण भी है,

हार के भय से मुक्त भले तू,

क्यूँ रक्त पिपासु तू हो चला ।।

Prashn (Questions)

26 Jan

भीघ रहा था बदन
और गगन से प्रश्न थे,

परोक्ष क्यूँ है खड़ी,
यह इंसानियत की नग्नता
क्यूँ काटते ख़ुशी को हम,
और अतृप्त क्यूँ है मन सदा.

बढ़ रही है क्यूँ भला,
यह भावना द्रोह की,
जो दिन नए तो आ रहे,
पर कर्म वही क्यूँ पाप का.

बूझ रहा हूँ अभी,
यह पहेली गर्भ की.
पाप पहले था खड़ा
या जन्म हुआ मनुष्य का.

मूक हूँ और लड़ रहा,
इन अश्रुओं की धार से.
जार-जार है बदन,
प्रश्न अब यह हँस रहे

भीग रहा है बदन,
और रंग लहू का है.
चोट है अपरोक्ष सी,
और गगन से प्रश्न है…
और गगन से प्रश्न है…