Twelve lines in ten minutes

14 Mar

Realized that writing in short bursts can be quite good.

हर दिन हर पल जो बांधता है,
यादों में यादों को ताकता है,
फिर चुप ही चुप में भांपता है,
आपका मेरा यह ठरकी दिल.

 

हर मुस्कान का मतलब रहा ढूंढता,
तकरार की पहेली रहा बुझता,
बावरा जो बावरा ना कह सका,
आपका मेरा यह ठरकी दिल.

 

लफ्फाजी की गफलत में फसा,
अलबेले जुमलो से सज़ा,
आखिर कब तक दम भरेगा,
आपका मेरा यह ठरकी दिल.

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Random Lines

12 Mar

Decided to pen few lines before starting with some serious work. Well, these are definitely romantic, but they arent written for someone specific. This reminds me of a latest conversation with my friend.

My Friend: Man, you write poems, that is impressive.

Me: Nah! I dont think so, but yeah sometimes I feel I write good.

My Friend: Its good tool to impress girls.

Me: I write in Hindi…

My Friend: Ohh…is that bad?

Me: I guess so. I am still single.

Meanwhile, enjoy these lines.

वोह आंसुओं में भी सागर को ढूंड लेते है,
वोह हालात-ऐ-दिल को अपनी चुनर में समेट लेते है,
वोह तो खुदा है इस बेज़ार दिल के,
ठगी है यह उनकी की वोह हमसे बेहतर हमको समझ लेते है…

The Man and The Bird (Maanav aur Parinda)

11 Mar

I have nearly spent an hour writing this poem. And even after spending all that time I wish to revisit this sometime later and edit it. The context is obvious, as I did not want to pretend a deep context, meanwhile what interest me about this poem is that its present structure offers me to write with three perspective, one that of the man, then of the bird and finally that of the narrator.

I dont like explaining my poems and hence I wont to do so…If its clear then it is, else it is not. For me, I will be revisiting this piece in near future.

झूट-सच से दूर, कहीं एक परिंदा है,
उड़ता है, कभी तो वो आंख मूंद के चलता है,
अलबेला है, गम-ख़ुशी से अन्बिघ्य
मुक्त गगन में वीर बन विचरता है,
पर मानव निर्मित परिभाषाओं से डरता है.

क्यूँ द्रवित हैं वो,
क्यूँ व्यथित हैं  वो,
मानव तो गलती से सीखा,
क्यूँ उस ज्ञान से भगता है वो.

मानव शायद सही है कहता,
झूट सच, गम ख़ुशी से भला कोन दूर है रहता,
मूढ़ है, अँधा है, और है वो बहरा भी,
परिभाषित तो पूर्ण जगत है,
क्यूँ डरता है? शायद अपनी मति की भरता है.

दम्भी है वो,
वाचाल है वो,
मानव तो अब उसपे हँसता,
क्यूँ सीधी बात ना समझता है वो.

धर्म अधर्म से दूर, तर्क बड़ा विचित्र है,
मूढ़ मति हो, या अँधा हो,
जब गगन है सबका, और पंख है उसके,
जब निश्चय उसका, और स्वप्न भी उसके,
तो क्यूँ परिभाषाएं सिर्फ मानव की.

है विरला वो,
धुनी है वो,
मानव नहीं, वोह है परिंदा!
और इसी बात को कह उड़ता है वो.

Few random lines…

9 Mar

Few lines were just bubbling through and I decided to pen them, rather than waiting for them to mature.

ह्रदय आह्लादित हुआ है फिर,
गाने को है गीत नए,
वोह सोचे और में सोचूं
क्या करूँ  की कहलाऊँ मृत्युंजय।

है विहंगम दृश्य बड़े यह,
समकक्ष खड़ी है नग्न धरा,
चित्र रचूँ या आंख भरूँ,
क्या करूँ की कहलाऊँ मृत्युंजय।

* * *

मैं मानव हूँ, मैं ही हूँ दानव,
प्रश्न करूँ क्यूँ फिर परमेश्वर से.
जब मैं हरता हूँ खुद ही जीवन,
तब दारुण दुःख से क्यूँ ह्रदय है विचलित.

Under creative pressure and a spewing brain…

3 Mar

I havent felt this alone in days. This is different kind of feeling, its not coming from sadness or homesickness. This is because of my desperation. At this moment I am having zillion of thoughts, and I can sound so incoherent that people may think I might very well be suffering from some mental disorder. So, I thought that it is better to write, and as narcissistic as I am, I thought that it will be better to blog about it.

I want to tell a story, and that story is developing faster than I can associate words with it. It is happening in front of me, developing frame by frame, emotions after emotions. All the characters that I have, all of them are evolving, faster than I can write about them. They are currently like some organic culture of microbes growing at exponential rate. It is paralyzing. More so when I am unable to find a person who could hear them developing.

One person whom I want to meet right now is Charlotte Bronte. I wish she were alive. Right now only I know how badly I want her to be alive and talking. In her absence, all I seek is a patient listener, who is in no position to judge me, who is in no position to establish references from my other stories. The second condition pushes my sister and few of my friends out of the list of potential listeners. Invariably this leaves no one in the list. Then the nature of the original source of idea kind of limits me to share it with anyone or everyone around me. Someone has to be truly agnostic towards the source, and ready to act as thought wall for me. Lets see, where am I going to find that person…

Only if this autonomous unfolding wasnt enough, I am also battling few philosophical issues. How fictional can a story be if it is based on real events and how much liberty can one take if those events are not from your life. I have already made my mind, I know what I am thinking but then there are self doubts. Amazing tricks; this mind surely knows its job.

Meanwhile here are few lines that wrote in utter desperation to ease some pressure –

बड़ी देर से,
हम बैठे हैं, कुछ सोच में डूबे है.
पूछ रहे हैं, पर होठ है सिले,
बड़ी देर से.

कुछ देर और,
वोह रुकेंगे, या वोह चलेंगे.
सर पे हाथ फेर, क्या गले लगेंगे,
कुछ देर और.

काश देर से,
सूरज गिरे, और चढ़े फिर चाँद.
झींगुर जागें, और चले हवा सहर की,
काश देर से.

I will fight…

17 Feb

मैं जागूँगा, मैं लडूंगा,
मैं गाऊंगा राग यही…
स्वप्न में दुस्वप्न में,
प्रेम में या घात में,
हो वीरता या अधीरता,
मन तृप्त हो, अतृप्त हो,
मैं करूँगा प्राण यही…
मैं जागूँगा, मैं लडूंगा,
मैं गाऊंगा राग यही…

Rakt Pipaasu (Blood Thirsty)

13 Feb

धर्म की ढाल, अधर्म की धार,

निश्चय कर, अभिमानित हो के,

क्यूँ कर्म के रथ पे आरूढ़ तू हो चला ।

रण भी है, प्रण भी है,

हार के भय से मुक्त भले तू,

क्यूँ रक्त पिपासु तू हो चला ।।

Karnataka ministers were watching porn in assembly…So What?

7 Feb

Watching porn isnt illegal in India, although I think that it can be illegal if it is watched in public places. Legal debate can be on whether assembly is considered as public place or not. Well I dont see any legal implication and their ouster or any punishment by speaker can easily be challenged in court. Now comes the question of morality… my advice… change your moral code if you want to stay… Say that watching porn is but only natural, and it was just an error in judgement and not something disastrously sinful. But I am sure that these ministers dont have guts to pull this off… On the bright side, (from what we know so far), it wasnt they who were in that porno.

If you want to know more about these ministers then feel free to head here.

Will we see a pro-porno minister? I guess not, but then who knows.

-via Times Of India

Prashn (Questions)

26 Jan

भीघ रहा था बदन
और गगन से प्रश्न थे,

परोक्ष क्यूँ है खड़ी,
यह इंसानियत की नग्नता
क्यूँ काटते ख़ुशी को हम,
और अतृप्त क्यूँ है मन सदा.

बढ़ रही है क्यूँ भला,
यह भावना द्रोह की,
जो दिन नए तो आ रहे,
पर कर्म वही क्यूँ पाप का.

बूझ रहा हूँ अभी,
यह पहेली गर्भ की.
पाप पहले था खड़ा
या जन्म हुआ मनुष्य का.

मूक हूँ और लड़ रहा,
इन अश्रुओं की धार से.
जार-जार है बदन,
प्रश्न अब यह हँस रहे

भीग रहा है बदन,
और रंग लहू का है.
चोट है अपरोक्ष सी,
और गगन से प्रश्न है…
और गगन से प्रश्न है…

Entangled with stars (Non literal translation) – Firaq Gorakhpuri

22 Jan

सितारों से उलझता जा रहा हूँ

सितारों से उलझता जा रहा हूँ
शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ

तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ
जहाँ को भी समझा रहा हूँ

यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है
गुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँ

अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट
ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ

हदें हुस्न-ओ-इश्क़ की मिलाकर
क़यामत पर कयामत ढा रहा हूँ

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे कायल भी करता जा रहा हूँ

भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ

तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस
कि तुझसे दूर होता जा रहा हूँ

जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज तक सूलझा रहा हूँ

मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ

ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
“फ़िराक़” अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ

 

Amazing poetry by Firaq Gorakhpuri.